Saturday, July 9, 2016

उसको तो फ़र्क पड़ता है



एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों लाखों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकनें लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा लाखों की संख्या में है, तू कितनों की जान बचाएगायह सुनकर बच्चे ने अपनी स्पीड और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहनें दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !

बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकतें हुए जोर से बोला माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता है" दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता हैं" ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !

हो सके तो लोगों को हमेशा होंसला और उम्मीद देनें की कोशिश करो, न जानें कब आपकी वजह से किसी की जिन्दगी वदल जाए! क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर "उसको तो फ़र्क पड़ता है!"...

Sunday, June 26, 2016

जानिये भगवान श्री कृष्ण जी की रानियों और पुत्रों के बारे में।


भगवान श्री कृष्ण की 16,100 रानियां, आठ पटरानियां तथा 80 पुत्र

भगवान श्री कृष्ण की 8 पत्नियां थी। प्रत्येक पत्नी से उन्हें 10 पुत्रों की प्राप्ति हुई थी इस तरह से उनके 80 पुत्र थे। इनके अलावा श्री कृष्ण की 16100 और पत्नियां बताई जाती है। इन 16100 कन्याओं को श्री कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध कर मुक्त कराया था और अपने यहाँ आश्रय दिया था। इन सभी कन्याओं ने श्री कृष्ण को पति स्वरुप मान लिया था।
  • 1) रुक्मणी :- महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। रूक्मिणी के पुत्रों के ये नाम थे- प्रद्युम्न, चारूदेष्ण, सुदेष्ण, चारूदेह, सुचारू, विचारू, चारू, चरूगुप्त, भद्रचारू, चारूचंद्र
  • 2) सत्यभामा :- सत्यभामा, सत्राजीत की पुत्री थी, सत्राजीत को शक्तिसेन के नाम से भी जानते है। सत्यभामा के पुत्रों के नाम थे- भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु
  • 3) सत्या :- सत्या राजा कौशल की पुत्री थी। सत्या के बेटों के नाम ये थे- वीर, अश्वसेन, चंद्र, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुंत
  • 4) जाम्बवंती :- जाम्बवंती, निषाद राज जाम्बवन की पुत्री थी। जाम्बवान उन गिने चुने पौराणिक पात्रों में से एक है जो रामायण और महाभारत दोनों समय उपस्तिथ थे। जाम्बवंती के पुत्र ये थे- साम्ब, सुमित्र, पुरूजित, शतजित, सहस्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ व क्रतु
  • 5) कालिंदी:- कृष्ण की पत्नी कालिंदी, खांडव वन की रहने वाली थी। यही पर पांडवो का इंद्रप्रस्थ बना था। कालिंदी के पुत्रों के नाम ये थे- श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास एवं सोमक
  • 6) लक्ष्मणा:- मद्र कन्या लक्ष्मणा, वृहत्सेना की पुत्री थी। लक्ष्मणा के पुत्रों के नाम थे- प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊध्र्वग, महाशक्ति, सह, ओज एवं अपराजित
  • 7) मित्रविंदा :- मित्रविंदा, अवन्तिका की राजकुमारी थी। मित्रविंदा के पुत्रों के नाम – वृक, हर्ष, अनिल, गृध, वर्धन, अन्नाद, महांश, पावन, वहिन तथा क्षुधि
  • 8) भद्रा :- कृष्ण की अंतिम पत्नी, भद्रा केकय कन्या थी। ये थे भद्रा के पुत्र – संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक

Monday, June 13, 2016

जिंदगी का कड़वा सच (Sukhdev Quotes)


जिसको मै अपना दोस्त समझता था, मुसीबत मे वो सबसे पहले मुझे अकेला छोड़ कर गया।

सुखों मे जिसको (मेरी अन्तरात्मा) मैने कभी नही पूछा, वो हमेशा सबसे पहले दुखो मे मदद को आया।

{सुखदेव की कलम से}

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Wednesday, March 30, 2016

शरीर के चक्र (Human Chakras)



1. मूलाधार चक्र :
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह "आधार चक्र" है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

मंत्र : "लं"
कैसे जाग्रत करें : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र 
यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

मंत्र : "वं"
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुर चक्र :
नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत "मणिपुर" नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

मंत्र : "रं"
कैसे जाग्रत करें: आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहत चक्र
हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही "अनाहत चक्र" है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.

मंत्र : "यं"
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और "सुषुम्ना" इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5.विशुद्ध चक्र
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां "विशुद्ध चक्र" है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र : "हं"
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र Iजाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में "आज्ञा-चक्र" है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। "बौद्धिक सिद्धि" कहते हैं।

मंत्र : "ॐ"
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस "आज्ञा चक्र" का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :
"सहस्रार" की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें : "मूलाधार" से होते हुए ही "सहस्रार" तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह "चक्र" जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही "मोक्ष" का द्वार है।

Thursday, March 3, 2016

Breatharian Prahlad Jani (No Food Nor Water For 10 Days)



Under strict observation for 10 days without any food or drink this Man still looks healthy and in good spirits.

Saturday, December 19, 2015

भगवान पर कैसा विश्वास होना चाहिए


यह कहानी एक आदमी कि है जो एक लम्बी हवाई यात्रा करके आ रहा था।

हवाई यात्रा ठीक ठाक चल रही थी तभी एक उदघोष हुआ कि कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें क्योंकि कुछ समस्या आ सकती है। तभी एक और उदघोष हुआ कि , " मौसम खराब होने के कारण कुछ गड़बड़ी होने की सम्भावना है अतः हम आपको पेय पदार्थ नहीं दे पाएंगे। कृपया अपनी सीट बेल्ट्स कस कर बांध लें। " जब उस व्यक्ति ने अपने चारों ओर अन्य यात्रियों की ओर देखा तो पाया कि वे किसी अनिष्ट की आशंका से थोड़े भयभीत लग रहे थे। कुछ समय के पश्चात फिर एक उदघोष हुआ, " क्षमा करें, आगे मौसम ख़राब है अतः हम आपको भोजन की सेवा नहीं दे सकेंगे। कृप्या अपनी सीट बेल्ट बांध लें ।" और फिर एक तूफ़ान सा आ गया। बिजली कड़कने और गरजने की आवाजें हवाई जहाज़ के अन्दर तक सुनायी देने लगीं। बाहर का ख़राब मौसम और तूफ़ान भी भीतर से दिखाई दे रहा था। हवाई जहाज़ एक छोटे खिलौने की तरह उछलने लगा। कभी तो जहाज़ हवा के साथ सीधा चलता था और कभी एकदम गिरने लगता था जैसे कि ध्वस्त हो जायेगा।


वह व्यक्ति बोला की अब वह भी अत्यंत भयभीत हो रहा था और सोंच रहा था कि यह जहाज़ इस तूफ़ान से सुरक्षित निकल पायेगा अथवा नहीं। फिर जब उसने अपने चारों ओर अन्य यात्रियों की ओर देखा तो उसने पाया कि सब ओर भय और असुरक्षा का सा माहौल बन चुका था। तभी उसने देखा कि एक सीट पर एक छोटी सी लड़की सीट पर पैर ऊपर करके आराम से बैठी एक पुस्तक पढ़ने में डूबी हुयी थी। उसके चेहरे पर चिंता की कोई शिकन तक नहीं थी। वह कभी-कभी कुछ क्षड़ो के लिए अपनी ऑंखें बंद करती और फिर आराम से पढने लग जाती थी। जब सभी यात्री भयाक्रांत हो रहे थे, जहाज़ उछल रहा था तब भी यह लड़की भय एवं चिन्ता से कोसों दूर थी और आराम से पढ़ रही थी। उस व्यक्ति को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ और जब वह जहाज़ अन्ततः सुरक्षित उतर गया। वह व्यक्ति सीधे उस लड़की के पास गया और उसने उससे पूँछा, कि इतनी खतरनाक परिस्तिथियों में भी वह बिलकुल नहीं डरी और एकदम शान्त किस प्रकार बनी हुयी थी। इस पर उस लड़की ने उत्तर दिया, " सर मेरे पिताजी इस विमान के चालक थे और वो मुझे घर ले जा रहे थे।

ऐसे ही अगर हम भगवान पर विश्वास करे तो हम कभी परेशान नहीं हो सकते क्यूंकि भगवान खुद वायदा करते है कि आप बच्चे बस एक कदम बढाओ तो मै आप बच्चों की तरफ हजार कदम बढ़ाएगे।

Friday, December 18, 2015

टेढ़े कान्हा



एक बार की बात है - वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण - राधे कृष्ण जप रहा था । 

अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला - अरे जपना ही है तो सीता राम जपो, क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ?

वृन्दावन का साधू भडक कर बोला - ज़रा जुबान संभाल कर बात करो, हमारी जुबान भी पान भी खिलाती हैं तो लात भी खिलाती है । तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ?

अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ? तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो- 
उनका नाम टेढ़ा - कृष्ण
उनका धाम टेढ़ा - वृन्दावन

वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया, पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है, ये तुम कैसे कह रहे हो ?

अयोध्या वाला साधू बोला - अच्छा अब ये भी बताना पडेगा ? तो सुन -

जमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माखन चुराना - ये कौन सीधे लोगों के काम हैं ? और आज तक ये बता कभी किसी ने उसे सीधे खडे देखा है कभी ?

वृन्दावन के साधू को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई , और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर । अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला - इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने । 

ये लो अपनी लुकटी, ये लो अपनी कमरिया, और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो ।
हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में ।

और सब पटक कर साधू चल दिये ।

अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे । साधू की बाँह पकड कर बोले अरे " भई तुझे किसी ने गलत भडका दिया है "

पर साधू नही माना तो बोले, अच्छा जाना है तो तेरी मरजी , पर ये तो बता राम जी सीधे और मै टेढ़ा कैसे ? कहते हुए बिहारी जी कूंए की तरफ नहाने चल दिये ।

वृन्दवन वाला साधू गुस्से से बोला -

" नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण,
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन,
काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा, कभी गोपियों के वस्त्र चुरा,
और सीधे तुझे कभी किसी ने खड़े होते नहीं देखा। तेरा सीधा है किया"।
अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बइज़्जती की सारी भड़ास निकाल दी।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुप से अपनी बाल्टी कूँए में गिरा दी । 

फिर साधू से बोले अच्छा चला जाइये, पर जरा मदद तो कर जा, तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं ।

साधू सरिया ला देता है और कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं ।

साधू बोला अब समझ आइ कि तौ मैं अकल भी ना है।
अरै सीधै सरिये से बाल्टी भला कैसे निकलेगी ?
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आवेगी ।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले - जब सीधापन इस छोटे से कूंए से एक छोटी सी बालटी नहीं निकाल पा रहा, तो तुम्हें इतने बडे भवसागर से कैसे पार लगा सकेगा ? 

अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की है ।

" बोलो टेढ़े वृन्दावन बिहारी लाल की जय "

Saturday, February 21, 2015

Meditation on Agnya chakra



When Kundalini pass through Agnya chakra, the person immediately becomes thoughtless and forgiving, which is the essence of this center, that is it allows us to forgive others.

Chakras and Channels of Energy


Inside every human being, there is a network of nerves and sensory organs that interprets the outside physical world.

At the same time, within us resides a subtle system of channels (nadis) and centers of energy (charkas).

Kundalini is a sleeping, dormant force in the human organism. Kundalini reside in the triangular shaped sacrum bone in three and a half coils.

Human body has seven power charkas. Each chakra has special characteristics and with proper training, moving Kundalini through these charkas, we can feel these characteristics.

Kundalini is interior experience of energy and consciousness that supports the realizing of our true nature.

Due to kundalini awakening, our interior space gets restructured so that our inner consciousness can flow more freely without attaching to our personality.

Due to Kundalini arises; we get some abilities like abilities to heal or the experience of bliss, or the freeing of inner voice or creativity so we become more expressive in World.

Rules for Kundalini Awakening
  • They require strict dietary rules, disciplined practice, non-stressed and simple lifestyle in order to have optimum potential for Kundalini awakening to occur and progress smoothly.
  • We must follow strictly celibacy for long period time till our Kundalini arises. 
During Kundalini awaking, it rises up from the muladhara chakra through the central nadi called sushumna inside the spine and reaching the top of the head. The progress of Kundalini through the different chakras leads to different levels of spiritual experience, until Kundalini finally reaches the top of the head, Sahasrara or crown charka.

During gradual progression of Kundalini from the base of the spine through the crown chakra leads to a releasing of various contractions in the energy body and at last person feel experience of merging into infinite consciousness.

Sunday, November 30, 2014

Dhyanalinga - Past, Present & Future



The historical aspects of ancient Indian temples, lingas and the consecration of Sadhguru's treasure to the world, the Dhyanalinga

Monday, November 10, 2014

Benefits of Meditation (Hindi) (80 Min) (720p HD)



What are the benefits of meditation in Human life according to Satyanaryan Sharma (LLB, Meditator)? There is lot of impacts of meditation on the human behaviour. Due to meditation, person gets rid of every type of jealous and greediness and he start thinking about wellness of all human civilization and natural world. (Voice : Hindi)

The Bhagwat Geeta is a doctrine of universal truth. Its message is universal, inspirational, and non-sectarian. The main principal of Bhagwat Geeta is "Do your duty as a service to the Lord and humanity and see God alone in everything in a spiritual frame of mind. One must learn to give up lust, anger, greed, and establish mastery over the six senses (hearing, touch, sight, taste, smell, and mind) by the purified intellect. One should always remember that all works are done by the energy of nature and that he or she is not the doer but only an instrument."

Monday, October 13, 2014

Dialogues of Angad with King Ravana in Katala Ramlila (Hindi) (720p HD)



Angad was the son of Vali and Tara and the nephew of Sugriva. Bali during the time of his death requested Sugriv to take care of his child. Sugriv consecrated Angad as the prince of Kiskindhya. 

In his efforts to seek a peaceful solution, Ram sent several messengers to Ravana; Angad was one of them. Angad described Ravan what was Ram`s wish and revealed that if he released Sita the war could possibly be prevented. He tried by every method to influence Ravan, but Ravan was firm at his decision to encounter a war rather than returning Sita calmly. 

At one stage, Angada planted his foot firmly on the ground and threw a challenge that if any person in Ravana's court uprooted his foot, Ram would lose the battle and return back with out Sita. All the rakshasa commanders of Ravana's army and even his son Indrajit tried to lift Angada's leg but none succeeded. 

Infuriated Ravana slowly walked towards Angada's planted foot and just as he was about to hold Angada's leg to attempt the challenge, Angada moved away and Ravana fell down. Angada explained that the challenge was for Ravana's commanders and not for Ravana. 

Angada hit the ground with both his hands with such tremendous force that it caused mild tremors on the earth. Ravana fell on the ground and his crowns rolled off his head. Ravana tried to pick up his crowns but before he could touch them, Angada picked four of them up and hurled them in the direction of Rama. 

Hanuman grabbed the flying crowns and put them in front of Ram. Ravan directed his men to trap and kill Angad but he laughed loudly and fled. In the great war of Ramyana, Angad killed Ravan`s son Devantak. 

Main Actors playing in Katala Ramlila
  • Ravana ~ Chhote Lal Pathak (Vrindavan) 
  • Angad ~ Shyam Sundar Sharma (Vrindavan) 
  • Lord Ram ~ Manish Kaushik (Mathura) 
  • Lakshman ~ Jagdish Sharma (Mathura)

Monday, September 1, 2014

The Chakras


The Chakras

Mantra related to Seven Chakras ~ Dr Darshan Dhamija (Hindi)



Watch out secret mantras related to seven chakras (Power Center) of Human bodies from Dr Darshan Dhamija (Cosmetic Healer) for improving Health and desires success. Our body has seven charkas (Power Center). Each chakra has own qualities and divine powers. We have one specific mantra for each chakra to wake up those holy powers. (Voice : Hindi)

Seven Chakra in Human Body during Meditation (Ver 2)


Seven Chakra in Human Body during Meditation (Ver 2)

Live Aarti of Maa Ganga at Har Ki Pauri (Haridwar) (Hindi) (1080p HD)



Har Ki Pauri is famous ghat on the banks of the Ganges in Haridwar in Uttarakhand.

Lord Shiva and Lord Vishnu are believed to have visited the Brahmakund in Har Ki Pauri in the Vedic times.

The Har Ki Pauri temple carries even more significance, because it preserves the footprints of Lord Shiva even to this day. Vedic chants and the sound of temple bells reverberate throughout the day.

Har Ki Pauri is also known as Brahmakund. According to the Hindu mythology, it was King Vikrmaditya who built the sacred bathing ghats in Har ki Pauri in the memory of his brother, Bhatrihari who had come to meditate in Haridwar.

Har ki Pauri is believed to be the place of exit of holy river Ganga from the mountains. 

Ganga Aarti is takes place in Brahmakund area of Har ki Pauri, a sacred spot where it is believe that the drops of the nectar (Amrit) fell over from the sky while being carried in a pitcher by the celestial bird Garuda after the Samudra Manthan.

According to the Hindu mythology, Lord Vishnu had visited Brahmkund in Har ki Pauri and a stone wall also has a large footprint which is believed to be belong to Lord Vishnu. 

In Sanskrit, Hari means "Lord Vishnu" and dwar means "gate" or "gateway" So, Haridwar stands for "Gateway to Lord Vishnu". Haridwar is also known as the home of Devi Sati and the palace of her father Daksha. In ancient times, the town was referred to as Gangadwar, the place where the Ganga descends to the plains.

Also known as the "Gateway to God" Haridwar is one of the Holiest places of the Hindus who visit Har Ki Pauri for a Holy Dip in the sacred Ganges.

A large number of people gather on both the banks of river Ganges to sing its praises. The priests hold large fire bowls in their hands, the songs in the temples at the Ghat start ringing. People float earthen Diyas, with burning flickers and flowers in them as a symbol of hope and wishes .The golden hues of floral diyas reflected in the river Ganges presents spectacular view.

Aarti symbolize 5 thing mainly these are 
  • Ether (Akash) 
  • Wind (Vayu) 
  • Fire (Agni) 
  • Water (Jal) 
  • Earth (Pruthvi)
In Sanskrit the meaning of "Aa" is "towards or to" and the meaning of "rati" is right or virtue". Ganga Aarti is a devotional ceremony that uses fire as an offering. It is usually made in the form of a lit lamp. A group of Brahmans offer their holy mantras to river Ganges during Ganga Aarti.

The devotees offer flowers and earthen lamps to river Ganges in order to pay due regards to their ancestors in heaven. 

Har Ki Pauri attracts millions of Hindu devotees from almost every corner of the earth. Throughout the day, devotees keep on taking a holy dip in the Ganges and offering prayers at Har Ki Pauri.

The Haridwar Ganga Sabha is an ancient Sabha that was came into being in the centaury of 1816. In 2005, the Ganga Mahasabha was restructured. After the restructuring Ganga Mahasabha has been playing the leading role in coordinating mass movements, public awareness campaigns and various other efforts to protect Mother Ganga.

Har ki Pauri is located at the centre of Haridwar city on the banks of river Ganga. One can reach easily at Har ki Pauri by auto rickshaw from Haridwar Bus Stand.

Ganga Aarti in Hardwar city starts at around 6.30pm on two times. Aarti is performed daily at the Har ki Pauri Ghat at Morning sunrise and evening sunset. Total duration of Aarti is 20 to 25 minutes.

Sunday, August 24, 2014

Secret of Happiness



Happiness depends to some extent upon external conditions but chiefly upon mental attitudes.

Conditions are neither good nor bad; they are always neutral, seeming to be either depressing or encouraging because of the sad or bright attitude of the mind of the individual concerned with them.

If you think you have some big problem, look at people who have a greater problem. Suddenly, you will get a confidence that your problem is much smaller, and you can manage it.

Look at your own life. In the past, you had many problems. They have all come and gone. Know that even this will go and you do have the energy and power to overcome it. 

You are always looking for solutions from someone. You forget that if you turn our mind inward, you can get some idea, some solution.

Change your thoughts if you wish to change your circumstances. Since you alone are responsible for your thoughts, only you can change them. Therefore, start now to think only those thoughts that will bring you health and happiness.

Successful people do not blame others for troubles that can usually be traced to their own actions and lack of understanding. They know that no one has any power to add to their happiness or detract from it unless they themselves are so weak that they allow the adverse thoughts and wicked actions of others to affect them.

The more you improve yourself, the more you will elevate others around you. The self-improving man is the increasingly happy man.

Avoid a negative approach to life. One may find some fault in even the greatest masterpieces of art, music, and literature. But isn’t it better to enjoy their charm and glory.

The ever new joy of God inherent in the soul is indestructible. You are an image of God; you should behave like a god. Resurrect yourself from the littleness of life, the little things that disturb you.

You have all creative ability, and you should work hard until your dreams are materialized.

You should keep busy doing constructive things for your own self-improvement and for the benefit of others. 

Happiness lies in making others happy. Some people think only of their own family but these are the very persons who do not become happy. To live for self is the source of all misery.

When you came into this world, you cried and everyone else smiled. You should so live your life that when you leave, everyone else will cry but you will be smiling.

The deeper you meditate and the more willingly you serve, the happier you will be.

Learn to carry all the conditions of happiness within yourself by meditating and attuning your realization to which is God. Your happiness should never be subject to any outside influence. Whatever your environment is, do not allow your inner peace to be touched by it.

You can keep that divine inner peace intact despite all painful thrusts of outer circumstance.

Be silent and calm every night and again in the morning before starting the day’s activity. 

The more you depend upon conditions outside yourself for happiness, the less happiness you will experience.

Night and day I am in a state of joy. That joy is God. To know Him is to perform the funeral rites for all your sorrows. He does not require you to be stoic and morose.

Without being happy you will not even be able to find Him. The happier you are, the greater will be your attachment with Him. Those who know Him are always happy, because God is joy itself.

I form new habits of thinking by seeing the good everywhere, and by beholding all things as the perfect idea of God made manifest.

I will make up my mind to be happy within myself right now, where I am today.

Basic Meditation Session by Sandeep Maheshwari (in Hindi)



"Meditation should not be a torture. It must be fun! Start small. Five to ten minutes a day is a great start!" ~ Sandeep Maheshwari